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वन पर्व
अध्याय १४३
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वैशम्पाय़न उवाच
मन्दीभूते च पवने तस्मिन्रजसि शाम्यति |  १६   क
महद्भिः पृषतैस्तूर्णं वर्षमभ्याजगाम ह ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति