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वन पर्व
अध्याय १४३
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वैशम्पाय़न उवाच
ततः सागरगा आपः कीर्यमाणाः समन्ततः |  १८   क
प्रादुरासन्सकलुसाः फेनवत्यो विशां पते ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति