वन पर्व  अध्याय १४३

वैशम्पाय़न उवाच

परिगृह्य द्विजश्रेष्ठाञ्श्रेष्ठाः सर्वधनुष्मताम् |  २   क
पाञ्चालीसहिता राजन्प्रय़युर्गन्धमादनम् ||  २   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति