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वन पर्व
अध्याय १४३
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वैशम्पाय़न उवाच
निर्जग्मुस्ते शनैः सर्वे समाजग्मुश्च भारत |  २१   क
प्रतस्थुश्च पुनर्वीराः पर्वतं गन्धमादनम् ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति