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वन पर्व
अध्याय १४३
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वैशम्पाय़न उवाच
सरांसि सरितश्चैव पर्वतांश्च वनानि च |  ३   क
वृक्षांश्च वहुलच्छाय़ान्ददृशुर्गिरिमूर्धनि |  ३   ख
नित्यपुष्पफलान्देशान्देवर्षिगणसेवितान् ||  ३   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति