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वन पर्व
अध्याय १४३
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वैशम्पाय़न उवाच
आत्मन्यात्मानमाधाय़ वीरा मूलफलाशनाः |  ४   क
चेरुरुच्चावचाकारान्देशान्विषमसङ्कटान् |  ४   ख
पश्यन्तो मृगजातानि वहूनि विविधानि च ||  ४   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति