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वन पर्व
अध्याय १४३
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वैशम्पाय़न उवाच
ततो रेणुः समुद्भूतः सपत्रवहुलो महान् |  ७   क
पृथिवीं चान्तरिक्षं च द्यां चैव तमसावृणोत् ||  ७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति