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द्रोण पर्व
अध्याय १४३
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सञ्जय़ उवाच
यज्ञसेनस्तु समरे कर्णपुत्रं महारथम् |  १४   क
षष्ट्या शराणां विव्याध वाह्वोरुरसि चानघ ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति