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द्रोण पर्व
अध्याय १४३
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सञ्जय़ उवाच
वृषसेनस्ततो राजन्नवभिर्द्रुपदं शरैः |  १९   क
विद्ध्वा विव्याध सप्तत्या पुनश्चान्यैस्त्रिभिः शरैः ||  १९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति