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वन पर्व
अध्याय ६५
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वृहदश्व उवाच
कुशली ते पिता राज्ञि जनित्री भ्रातरश्च ते |  २८   क
आय़ुष्मन्तौ कुशलिनौ तत्रस्थौ दारकौ च ते |  २८   ख
त्वत्कृते वन्धुवर्गाश्च गतसत्त्वा इवासते ||  २८   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति