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द्रोण पर्व
अध्याय १४३
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सञ्जय़ उवाच
प्रदीपैर्हि परित्यक्तैर्ज्वलद्भिस्तैः समन्ततः |  २२   क
व्यराजत मही राजन्वीताभ्रा द्यौरिव ग्रहैः ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति