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द्रोण पर्व
अध्याय १४३
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सञ्जय़ उवाच
तांस्तु निर्जित्य समरे कर्णपुत्रो व्यरोचत |  २६   क
मध्यन्दिनमनुप्राप्तो घर्मांशुरिव भारत ||  २६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति