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द्रोण पर्व
अध्याय १४३
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सञ्जय़ उवाच
प्रतिविन्ध्यं तु समरे कुर्वाणं कर्म दुष्करम् |  ३१   क
दुःशासनस्त्रिभिर्वाणैर्ललाटे समविध्यत ||  ३१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति