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द्रोण पर्व
अध्याय १४३
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सञ्जय़ उवाच
दुःशासनं तु समरे प्रतिविन्ध्यो महारथः |  ३३   क
नवभिः साय़कैर्विद्ध्वा पुनर्विव्याध सप्तभिः ||  ३३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति