द्रोण पर्व  अध्याय १४३

सञ्जय़ उवाच

विरथः स तु धर्मात्मा धनुष्पाणिरवस्थितः |  ३७   क
अय़ोधय़त्तव सुतं किरञ्शरशतान्वहून् ||  ३७   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति