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द्रोण पर्व
अध्याय २
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कर्ण उवाच
एवं चैषां वुध्यमानः प्रभावं; गत्वैवाहं ताञ्जय़ाम्यद्य सूत |  १९   क
मित्रद्रोहो मर्षणीय़ो न मेऽय़ं; भग्ने सैन्ये यः सहाय़ः स मित्रम् ||  १९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति