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द्रोण पर्व
अध्याय ५५
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सञ्जय़ उवाच
हा पुत्र मम मन्दाय़ाः कथं संय़ुगमेत्य ह |  २   क
निधनं प्राप्तवांस्तात पितृतुल्यपराक्रमः ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति