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द्रोण पर्व
अध्याय १४३
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सञ्जय़ उवाच
ततस्तूर्णं चित्रसेनो नाकुलिं नवभिः शरैः |  ८   क
विव्याध समरे क्रुद्धो भरतानां महारथः ||  ८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति