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शान्ति पर्व
अध्याय ३०४
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याज्ञवल्क्य उवाच
यत्र दृश्येत मुञ्चन्वै प्राणान्मैथिलसत्तम |  १०   क
वाताधिक्यं भवत्येव तस्माद्धि न समाचरेत् ||  १०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति