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शान्ति पर्व
अध्याय १८४
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भृगुरु उवाच
उञ्छवृत्तिर्गृहस्थो यः स्वधर्मचरणे रतः |  १८   क
त्यक्तकामसुखारम्भस्तस्य स्वर्गो न दुर्लभः ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति