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शान्ति पर्व
अध्याय ४६
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वैशम्पाय़न उवाच
यस्य ज्यातलनिर्घोषं विस्फूर्जितमिवाशनेः |  १२   क
न सहेद्देवराजोऽपि तमस्मि मनसा गतः ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति