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आदि पर्व
अध्याय १४४
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वैशम्पाय़न उवाच
क्वचिद्वहन्तो जननीं त्वरमाणा महारथाः |  ४   क
क्वचिच्छन्देन गच्छन्तस्ते जग्मुः प्रसभं पुनः ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति