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शान्ति पर्व
अध्याय १४४
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भीष्म उवाच
नाहं ते विप्रिय़ं कान्त कदाचिदपि संस्मरे |  २   क
सर्वा वै विधवा नारी वहुपुत्रापि खेचर |  २   ख
शोच्या भवति वन्धूनां पतिहीना मनस्विनी ||  २   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति