शान्ति पर्व  अध्याय १४४

भीष्म उवाच

आकाशगमने चैव सुखिताहं त्वय़ा सुखम् |  ५   क
विहृतास्मि त्वय़ा कान्त तन्मे नाद्यास्ति किञ्चन ||  ५   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति