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द्रोण पर्व
अध्याय १०७
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सञ्जय़ उवाच
राष्ट्राणां स्फीतरत्नानां हरणं च तवात्मजैः |  १०   क
सततं च परिक्लेशान्सपुत्रेण त्वय़ा कृतान् ||  १०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति