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अनुशासन पर्व
अध्याय १४४
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वासुदेव उवाच
स स्म सञ्चरते लोकान्ये दिव्या ये च मानुषाः |  १३   क
इमा गाथा गाय़मानश्चत्वरेषु सभासु च ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति