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अनुशासन पर्व
अध्याय १४४
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वासुदेव उवाच
दुर्वाससं वासय़ेत्को व्राह्मणं सत्कृतं गृहे |  १४   क
परिभाषां च मे श्रुत्वा को नु दद्यात्प्रतिश्रय़म् |  १४   ख
यो मां कश्चिद्वासय़ेत न स मां कोपय़ेदिह ||  १४   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति