अनुशासन पर्व  अध्याय १४४

वासुदेव उवाच

शृणुष्वावहितो राजन्द्विजानां भरतर्षभ |  २   क
यथातत्त्वेन वदतो गुणान्मे कुरुसत्तम ||  २   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति