अनुशासन पर्व  अध्याय १४४

वासुदेव उवाच

ततोऽहं ज्वलमानं वै पाय़सं प्रत्यवेदय़म् |  २१   क
तद्भुक्त्वैव तु स क्षिप्रं ततो वचनमव्रवीत् |  २१   ख
क्षिप्रमङ्गानि लिम्पस्व पाय़सेनेति स स्म ह ||  २१   ग
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति