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अनुशासन पर्व
अध्याय १४४
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वासुदेव उवाच
मुनिः पाय़सदिग्धाङ्गीं रथे तूर्णमय़ोजय़त् |  २४   क
तमारुह्य रथं चैव निर्ययौ स गृहान्मम ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति