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अनुशासन पर्व
अध्याय १४४
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वासुदेव उवाच
अग्निवर्णो ज्वलन्धीमान्स द्विजो रथधुर्यवत् |  २५   क
प्रतोदेनातुदद्वालां रुक्मिणीं मम पश्यतः ||  २५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति