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वन पर्व
अध्याय ६२
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वृहदश्व उवाच
न हि ते मानुषं रूपं भूषणैरपि वर्जितम् |  २४   क
असहाय़ा नरेभ्यश्च नोद्विजस्यमरप्रभे ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति