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शान्ति पर्व
अध्याय २२४
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भीष्म उवाच
लोकान्नदीः समुद्रांश्च दिशः शैलान्वनस्पतीन् |  ४६   क
नरकिंनररक्षांसि वय़ःपशुमृगोरगान् |  ४६   ख
अव्ययं च व्ययं चैव द्वय़ं स्थावरजङ्गमम् ||  ४६   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति