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अनुशासन पर्व
अध्याय १४४
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वासुदेव उवाच
रुक्मिणीं चाव्रवीत्प्रीतः सर्वस्त्रीणां वरं यशः |  ४०   क
कीर्तिं चानुत्तमां लोके समवाप्स्यसि शोभने ||  ४०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति