अनुशासन पर्व  अध्याय १४४

वासुदेव उवाच

प्रविष्टमात्रश्च गृहे सर्वं पश्यामि तन्नवम् |  ४७   क
यद्भिन्नं यच्च वै दग्धं तेन विप्रेण पुत्रक ||  ४७   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति