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वन पर्व
अध्याय १४४
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वैशम्पाय़न उवाच
सुखं प्राप्स्यति पाञ्चाली पाण्डवान्प्राप्य वै पतीन् |  १३   क
इति द्रुपदराजेन पित्रा दत्ताय़तेक्षणा ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति