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वन पर्व
अध्याय १४४
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वैशम्पाय़न उवाच
तत्सर्वमनवाप्यैव श्रमशोकाद्धि कर्शिता |  १४   क
शेते निपतिता भूमौ पापस्य मम कर्मभिः ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति