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वन पर्व
अध्याय १४४
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वैशम्पाय़न उवाच
ते समाश्वासय़ामासुराशीर्भिश्चाप्यपूजय़न् |  १६   क
रक्षोघ्नांश्च तथा मन्त्राञ्जेपुश्चक्रुश्च ते क्रिय़ाः ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति