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वन पर्व
अध्याय १४४
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वैशम्पाय़न उवाच
पठ्यमानेषु मन्त्रेषु शान्त्यर्थं परमर्षिभिः |  १७   क
स्पृश्यमाना करैः शीतैः पाण्डवैश्च मुहुर्मुहुः ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति