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वन पर्व
अध्याय १४४
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वैशम्पाय़न उवाच
सेव्यमाना च शीतेन जलमिश्रेण वाय़ुना |  १८   क
पाञ्चाली सुखमासाद्य लेभे चेतः शनैः शनैः ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति