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वन पर्व
अध्याय १४४
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वैशम्पाय़न उवाच
परिगृह्य च तां दीनां कृष्णामजिनसंस्तरे |  १९   क
तदा विश्रामय़ामासुर्लव्धसञ्ज्ञां तपस्विनीम् ||  १९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति