वन पर्व  अध्याय १४४

वैशम्पाय़न उवाच

तामवेक्ष्य तु कौन्तेय़ो विवर्णवदनां कृशाम् |  ९   क
अङ्कमानीय़ धर्मात्मा पर्यदेवय़दातुरः ||  ९   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति