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उद्योग पर्व
अध्याय १४४
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वैशम्पाय़न उवाच
ततः सूर्यान्निश्चरितां कर्णः शुश्राव भारतीम् |  १   क
दुरत्ययां प्रणय़िनीं पितृवद्भास्करेरिताम् ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति