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द्रोण पर्व
अध्याय १४४
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सञ्जय़ उवाच
सोऽतिविद्धो महाराज रथोपस्थ उपाविशत् |  १२   क
तं विसञ्ज्ञं निपतितं दृष्ट्वा स्यालं तवानघ |  १२   ख
अपोवाह रथेनाशु सारथिर्ध्वजिनीमुखात् ||  १२   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति