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द्रोण पर्व
अध्याय १६९
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सञ्जय़ उवाच
पाञ्चालाश्चलिता धर्मात्क्षुद्रा मित्रगुरुद्रुहः |  १८   क
त्वां प्राप्य सहसोदर्यं धिक्कृतं सर्वसाधुभिः ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति