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द्रोण पर्व
अध्याय १४४
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सञ्जय़ उवाच
शिखण्डिनं तु समरे द्रोणप्रेप्सुं विशां पते |  १५   क
कृपः शारद्वतो यत्तः प्रत्युद्गच्छत्सुवेगितः ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति