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द्रोण पर्व
अध्याय १४४
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सञ्जय़ उवाच
शरजालावृतं व्योम चक्रतुस्तौ महारथौ |  १९   क
प्रकृत्या घोररूपं तदासीद्घोरतरं पुनः ||  १९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति