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द्रोण पर्व
अध्याय १४४
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सञ्जय़ उवाच
तस्य क्रुद्धः कृपो राजञ्शक्तिं चिक्षेप दारुणाम् |  २२   क
स्वर्णदण्डामकुण्ठाग्रां कर्मारपरिमार्जिताम् ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति