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द्रोण पर्व
अध्याय १७२
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सञ्जय़ उवाच
चुक्रुशुर्दानवाश्चापि दिक्षु सर्वासु भैरवम् |  १७   क
रुधिरं चापि वर्षन्तो विनेदुस्तोय़दाम्वरे ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति