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द्रोण पर्व
अध्याय १४४
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सञ्जय़ उवाच
स छाद्यमानः समरे गौतमेन यशस्विना |  २५   क
व्यषीदत रथोपस्थे शिखण्डी रथिनां वरः ||  २५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति